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जैविक और प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रदर्शनी सफलतापूर्वक संपन्न

जैविक और प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रदर्शनी सफलतापूर्वक संपन्न

नागपुर 25 फरवरी 2025

प्रतिनिधी सतीश कडू नागपूर

क्षेत्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र, भारत सरकार, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय(आईएन एम डिवीज़न), नागपुर एवं जी‌. एच. रायसोनी विश्वविद्यालय, नागपुर के सहयोग से दिनांक 22 एवं 23 फरवरी 2025 को “जैविक और प्राकृतिक खेती” पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रदर्शनी का भव्य आयोजन वनामती ऑडिटोरियम, नागपुर में संपन्न हुआ।
इस संगोष्ठी का आयोजन डॉ अजय सिंह राजपूत, क्षेत्रीय निदेशक, आरसीएनएफ, नागपुर, डॉ. प्रवीण कुमार वूटला, आरसीओएनएफ, नागपुर एवं डॉ केविन गवली डीन रायसोनी विश्वविद्यालय द्वारा किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि श्री मनोज सोलंकी, पूर्व संयुक्त सचिव आईएनएम एवं राज्य निर्वाचन आयुक्त तेलंगाना – मैडम रानी कुमुदिनी, पद्मश्री पुरस्कार विजेता – श्री चिंतला वेंकट रेड्डी, पद्मश्री पुरस्कार विजेता – श्री भारत भूषण त्यागी, परभणी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति – डॉ. इंद्रमणि मिश्रा, रायसोनी विश्वविद्यालय के कुलपति श्री सुनील राय सोनी और कुलपति डॉ. मीणा राजेश उपस्थित हुए एवं अन्य कई कृषि जगत की प्रतिष्ठित हस्तियों ने इसमें भाग लिया।

मैडम रानी कुमुदिनी ने इस संगोष्ठी में जैविक और प्राकृतिक खेती से सम्बंधित सरकारी नीतियों, टिकाऊ कृषि समाधानों और किसानों की सफलता की कहानियों पर गहन चर्चा की।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए पद्मश्री भरत भूषण त्यागी ने कहा, “जैविक और प्राकृतिक खेती केवल एक कृषि पद्धति नहीं, बल्कि यह हमारे पर्यावरण, मिट्टी और मानव स्वास्थ्य को संरक्षित करने की एक जीवनशैली है। हमें पारंपरिक कृषि ज्ञान को संरक्षित रखते हुए नवाचारों को अपनाने की जरूरत है, ताकि हम अगली पीढ़ी को स्वस्थ और समृद्ध भविष्य दे सकें।” उन्होंने किसानों को आत्मनिर्भर बनने के लिए सामुदायिक खेती और नवाचारों पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी।

पद्मश्री Chintala Venkat reddy ने अपने उद्बोधन में जैविक और प्राकृतिक खेती की सामाजिक और आर्थिक प्रभावशीलता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “हमें अपनी कृषि पद्धतियों में प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अति प्रयोग ने हमारी मिट्टी और जल को प्रभावित किया है, लेकिन जैविक और प्राकृतिक खेती इस संकट से उबरने का एकमात्र समाधान है।” उन्होंने अपनी Soil and nutrient management technique के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

सभा को संबोधित करते हुए डॉ. ए. एस. राजपूत ने आधुनिक अनुसंधान और पारंपरिक जैविक खेती तकनीकों के संयोजन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि “यदि हम पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक नवाचारों से जोड़ दें, तो हम एक टिकाऊ कृषि भविष्य की ओर अग्रसर हो सकते हैं।”

कार्यक्रम का समापन एक गतिशील पैनल चर्चा और इंटरैक्टिव प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ, जिसमें कृषि क्षेत्र में नवाचार और भविष्य की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया। इस संगोष्ठी ने कृषि अनुसंधान, जैविक खेती और प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न संस्थानों और किसानों के बीच सहयोग के नए अवसर खोल दिए।

डॉ ए.एस. राजपूत के मार्गदर्शन में इस भव्य आयोजन की सफलता में RCONF के डॉ प्रवीण कुमार वूटला, डॉ. स्वपनिल मगर, डॉ प्रियंका मेहता, डॉ. सरिता कुमारी यादव, श्री बिहारी लाल, श्री रमेश चंद, श्री सुशील तलमले एवं कार्यालय के सभी अन्य कर्मचारीगनो जैसे श्री ललित नाईक एवम श्री शिव कुमार पटेल तथा डॉ. परेश बाविस्कर, डॉ. आशुतोष राजौरिया, प्रो. शुभाशीष रक्षित, डॉ. आशीष सारडा, डॉ. राकेश तुरकर और स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज, जी एच रायसोनी विश्वविद्यालय, साईखेड़ा, इन सभी की समर्पित टीम को जाता है। उनकी सटीक योजना और निष्पादन ने इस संगोष्ठी को एक प्रभावशाली और प्रेरणादायक आयोजन बना दिया।

“जैविक और प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रदर्शनी” की भव्य सफलता यह दर्शाती है कि भारत में टिकाऊ कृषि की ओर किसानों की रुचि और जागरूकता लगातार बढ़ रही है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से न केवल उन्नत कृषि तकनीकों का आदान-प्रदान होता है, बल्कि किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जाते हैं। यह संगोष्ठी कृषि के सुनहरे भविष्य की ओर एक और बड़ा कदम साबित हुई।

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